चाँदनी

चाँदनी 


चाँदनी वो सरक गई,

न जाने कैसे लहक गई,

मन के भीतर कुछ बहक गई,

दूर-दूर तक फैल गई,-

कोर-कोर में, पोर-पोर में, रग-रेशों में!


स्वच्छ ऊर्मियाँ छहर गईं,

तबीयत के कोने-कोने में फहर गईं! 


सतीश 

अगस्त 24, 2024. 


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