देश का रक्षा-बंधन

 देश का रक्षा-बंधन

वो भी किसी की बहन होगी,
वो भी किसी की बेटी होगी,
पर, सभ्यता का तट वह पा न सकी,
संस्कृति का शील देख नहीं सकी!

स्वतंत्रता के पचहत्तर से अधिक वर्षों के बाद भी
व्यवस्था की वर्तिका सही-सही जलती नहीं, 
उसकी चरित्र-कथा ठीक से उजलती नहीं,
बड़े, शोख़ वादों, दावों के बीच
पैसे, पहुँच, पैरवी के रोर-शोर में, 
नीचे-से-नीचे जाने की होड़ में 
यंत्र-तंत्र की व्यवहार-संहिता बदलती नहीं! 


तब राष्ट्र रक्षा के सुंदर बंध कैसे बनायेगा?
मुक्ति के पट कैसे फैलायेगा? 
अराजकताओं के अंहकारों, आलापों, 
विलापों को कैसे थामेगा? 
वह अपने आप को सुरक्षा-कवच कैसे पहनायेगा? 
रक्षा-प्रतिरक्षा के सूत्र कैसे गढ़ेगा? 

सतीश 
अगस्त 18/19, 2024, रक्षा-बंधन। 


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