तुम, भोर के विन्यास सी!
तुम, भोर के विन्यास सी!
तुम एक फूल हो, फूल की सुंदरता भी हो,
तुम एक जीवन-आयाम, जीवन की सकलता भी हो!
तुम जीवन हो, जीवन की भाषाएँ भी हो,
तल-अतल में छिपी-अनछिपी सुंदर आशाएँ भी हो!
मेरी नसों में तुम्हारे व्यक्तित्व का बल है,
वहाँ तुम्हारी काया, कविता और कल्पना सकल है!
खड़ी हो, तनी हो, बैठी हो, झुकी हो, लेटी हो,
लगता है, थिर-अथिर शाश्वत सृष्टि समेटी हो!
रोज़मर्रा की आवश्यकताओं, मकान-दुकान को
खोजता-जुटाता मैं एक पुरूष-याचक हूँ,
तुम अपनी कृतियों से बँधी, उन्हें जुगाती,
भविष्य की तानों को पकड़ती, सँभालती, तानती
भाग्य हो, भविष्य हो, सम्पूर्ण भविष्य-सृजक हो!
लगता है, कहती हो-
मैं चर हूँ, अचर हूँ, सहचर हूँ,
मैं जल हूँ, समुद्र हूँ,
लघु-अलघु विस्मृत-अविस्मृत लहर हूँ!
लगता है, कहती हो -
मैं लीक हूँ, नवेली लकीर भी हूँ,
कभी पास आये, कभी फिसल जाये,
कभी छूट जाये, कभी मिल जाये,
प्रकृति का वह सीधा-सहज शरीर हूँ!
लगता है, कहती हो -
पत्थरों पर मैं बिछी हूँ
कल्पना की भंगिमा सी,
पूरब के चेहरे पर
विभोर भोर के विन्यास-सी, विस्तार सी!
लगता है, कहती हो -
मैं शक्ति हूँ, समर्पण भी हूँ,
मैं आज हूँ, आज का दर्शन भी हूँ,
मैं भविष्य हूँ, भविष्य का दर्पण भी हूँ,
जो कभी सिमट-सिकुड़ जाये, कभी पसर-फैल जाये,
प्रकृति-सृष्टि की उस कविता-कहानी का आँचल भी हूँ!
⁃ सतीश, 2019
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