महानगर
महानगर
महानगर में प्राय:
नगर महान् हो जाता है,
लोग छोटे रह जाते हैं!
महानगर में प्राय:
नगर तन से फैलता जाता है,
लोग मन से सिकुड़ते जाते हैं!
महानगर में प्राय:
आम लोगों के लिए
घर की चौहद्दी छोटी हो जाती है,
घरेलूपन और छोटा होता जाता है!
महानगर में प्राय:
गति की विधा जड़ हो जाती है,
लोग जड़ से कट जाते हैं,
चाहे-अनचाहे कटते रहते हैं।
महानगर में प्राय:
सभ्यता कुछ अधिक व्यस्त हो जाती है,
कई बार मन और मनुष्य हाँफने लगते हैं,
हाँफते रहते हैं!
महानगर में प्राय:
तेज-तर्रार मति हमें कुचलना चाहती है,
मनुष्य और मनुष्यता बचने के दाँव-पेंच में जुटे रहते हैं!
महानगर में प्राय:
महानगरीय बनने की आस में,
निरंतर कुछ और दिखने के प्रयास में
मनुष्यता एक घटना हो जाती है,
वह घटती ही रहती है!
- सतीश
सितम्बर 15, 2024.
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