स्वप्न
स्वप्न
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स्वप्न कि
सभ्यता के आँसुओं को पोंछ दूँ,
संस्कृति के मन को गुन लूँ।
स्वप्न कि
धरती की धूल से लिपट लूँ,
आकाश की सोच को थाम लूँ ।
स्वप्न कि
हर संघर्ष में सुलग लूँ,
हर प्राप्ति में शालीन रहूँ ।
स्वप्न कि
किरणों की प्रवृत्तियों को पढ़ लूँ,
अंधेरों की व्याप्ति को परख लूँ ।
स्वप्न कि
समय के रव को समझ लूँ,
शून्य की चुप्पी को बोध लूँ ।
स्वप्न कि
मानवता की आह, कचोट से जुड़ सकूँ,
जीवन-यज्ञ की सु-अग्नि में उजल सकूँ।
स्वप्न !
सतत् ! अनवरत !
⁃ सतीश
अक्टूबर 6, 2024
(सिंगापुर के रास्ते में)
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