बेटी, तुम !
बेटी, तुम !
जो कभी बीत न सके,
तुम जीवन की वह शील-कथा बनो!
जो कभी रीत न सके,
तुम जीवन की वह दिव्य प्रथा बनो!
कोई सीमा-रेखा, कोई चौहद्दी जिसे समेट न सके,
तुम जीवन का वह अपरिमित मानचित्र बनो!
युगों से युगांतर तक जो चलती रही, बढ़ती रहे,
तुम जीवन की वह अनंत रीति बनो,
कल्प से कल्पांतर तक जो मनभावन बनी रहे,
तुम जीवन की वह प्यारी लोरी बनो!
लक्ष्यों, मंज़िलों, मील-स्तम्भों से परे
तुम जीवन की एक पवित्र यात्रा बनो,
तुम उस यात्रा का परम पथिक, चरम साधिका बनो!
जब-जब काली घटाएँ घिरे,
तुम उनको मर्यादा के गुलाल की गहरी लाली दे देना,
उनके चरित्र को अपने मन का सुंदर संस्कार दे देना,
अपने व्यक्तित्व की भव्य छवि, पुनीत परिष्कार दे देना!
ऐ बाल-भोर!
हर क्षितिज से उठकर
जीवन की पत्ती-पत्ती में, पोर-पोर में,
कोर-कोर में, विंदु-विंदु, वर्ण-वर्ण में,
उजालों की हर आस में, हर विन्यास में
बस जाने वाली, रम जाने वाली,
लीन-तल्लीन, लय हो जाने वाली
धवल किरणों की उज्ज्वल
शक्ति-संस्कृति, शालीन समृद्धि बनो!
सतीश
अक्टूबर 12, 2014
विजयादशमी
जोधपुर, राजस्थान
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