वो नदी, वो हवा
वो नदी, वो हवा
वो नदी चुपचाप बह रही है,
अपनी यादों में तरल होती हुई।
शरीर पर बन आई हैं,
सीधी-टेढ़ी सप्राण लकीरें,
स्मृतियों के घुमावों से गुजर कर।
दूर बसी भावनाओं से होकर आती
मन से कुछ हल्की, ठिठोली करती हवा
नदी की नसों में कुछ स्पंदन भरती,
हिलोरें बनाती, यहाँ-वहाँ पुलक की घूर्णियाँ रचती,
नीले-नीले जल को बारी-बारी से
स्नेहिल संकुचन, सिहरन और प्रसार देती;
फिर, बिना कुछ कहे स्वयं बह जाती !
इधर, नदी अपने अनुद्विग्न किनारों से
खेलती चुपचाप बह रही है,
बहती ही जा रही है!
⁃ सतीश
अक्टूबर 8, 2024.
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