मृत्यु क्या है?

मृत्यु क्या है? 


हम जानते हैं, मृत्यु क्या है? 

उसे कुछ पहचानते हैं? 


क्या वह है,

शून्य को आकृति देती एक परम परिधि ? 

शून्यता के शरीर पर एक सशब्द लिखावट? 


या जीवन की अंतिम विधा,

जो मानव और मानवता को 

भर देती है चरम वेदना से! 


या

जीवन के होंठों पर प्रकृति का

एक निर्विकार चुम्बन जिसकी झंकारें

हमारे अस्तित्व के संदर्भों को

लोक से अलोक तक फैला देती हैं,

उसे अलौकिक बना देती हैं, 

कुछ आध्यात्मिकता दे देती हैं? 


या मृत्यु है,

आत्मा और शरीर के आत्मीय अनुबंध 

का अंतिम छंद?

या 

सृष्टि की ऐसी छलनी 

जो अर्थों को व्यर्थों से अलग कर देती है? 

या नियति का एक उपक्रम 

जो अविचल मौन को 

सारे नादों, निनादों से ऊपर रख देता है?


या एक शाश्वत प्रश्न 

जो बार-बार पूछ लेता है कि 

हमें एक दिन मरना ही होता है,

तो, हर दिन हम क्यों मरते हैं? 


या जीवन-वाक्य का ऐसा विराम-चिन्ह 

जो सहजता से पूछ बैठता है कि

बताओ न, तेरा जीवन कुछ राममय रहा या नहीं? 



सतीश 

नवम्बर 3, 2024. 




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