तुम, तुम्हारी काया
तुम, तुम्हारी काया
तेरी काया, जीवन की सप्राण छाया!
सबसे सुंदर आकृति, सबसे सहज कृति!
तेरा दर्शन है, सबसे आत्मीय दार्शनिकता !
चाहता हूँ, उस चाँदनी की मुस्कुराहट,
मन-तन की फुदकती लिखावट को पढ़ लूँ;
उसके कलेजे में आती-जाती साँसों की
अकारण या सकारण आहट को सुन लूँ;
उसकी उजली-उजली ऊर्मियों की स्फूर्ति को धर लूँ,
उसकी तीक्ष्ण उष्णता में डूब लूँ!
मालूम है, तुम उसे अतिशय शीतलता कहोगे!
या, जीवन का स्पष्ट वरण कहोगे?
या रिक्त, अतिरिक्त आवरण कहोगे?
संभव है, तुम उसे अतिरंजित वेदना कह दोगे?
या, फिर, सहज संवेदना कहोगे?
⁃ सतीश
अक्टूबर 27, 2024.
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