कुछ कहे, कुछ अनकहे
कुछ कहे, कुछ अनकहे
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छोटे से क़द में
देह की भाव-भंगिमाएँ
सौंदर्य को कुछ और सुंदर बनातीं;
छरहरी धूप के शरीर में मोहक चंचलता भरतीं,
उत्सुक हवा की तबीयत को हिलातीं-डुलातीं,
उसे लोल-ललित, सुशीतल बनातीं;
मन की धरती पर धीरे से अनायास
सहज स्मृतियों का एक लघु,
प्रसन्न टुकड़ा रख देतीं!
कुछ पल यों ही आते,
फिर, चुपके से चले जाते;
कुछ कहते हैं वे,
कुछ अनकहे रह जाते!
⁃ सतीश
मई 3, 2024.
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