लघु यात्रा, बड़े द्वंद्व

  लघु यात्रा, बड़े द्वंद्व 


राजनीति है समाज की आवश्यक आवश्यकता।

पर, कई बार वह ऊबा देती है

अपने छोटेपन से, अपने ओछेपन से!

प्राय:, वह गर्जना में अति व्यस्त रहती है,

सर्जना को भूल जाती है! 


साहित्य की एक लघु यात्रा

मन को क्षरण से बचा लेती है,

चरित्र को कुछ औषधि देती है,

ह्रदय में बसे खालीपन को

विशदता से भर देती है! 


पर, कई बार लेखन-क्रिया 

निराशा में समाधिस्थ रहती है,

रोदन को आत्म-सिद्धि मानती है,

कर्म की कठोर भूमि से हटा कर 

पलायन की ओर भेज देती है;

चिंतन से अधिक चिंता में क़ैद कर देती है,

बुद्धि के अराजक प्रलाप-विलाप में 

हमें असहाय धकेल देती है! 


एक लघु यात्रा के ये बड़े द्वंद्व! 



-सतीश 

अप्रैल 11, 2024. 








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