चाहती है कविता

 चाहती है कविता


चाहती है कविता कि वह बड़ी हो जाये,

जीवन अपने छोटेपन से निकल नहीं पाता!


चाहती है कविता कि वो सुंदर हो जाये,

गतिविधियाँ, मनोवृत्तियाँ ऊपर उठ नहीं पातीं! 


चाहती है कविता कि राजनीति ऊपर चढ़ जाये,

भाव-चरित्र “नारेबाज़ी” से आगे बढ़ नहीं पाते! 


चाहती है कविता कि वह पुण्य आहुति हो जाये,

स्वार्थों की जकड़ थोड़ी भी ढीली हो नहीं पाती!  



सतीश

April 28, 2024. 




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