बोल निर्झर, बोल

बोल निर्झर, बोल 


बोल निर्झर, बोल, तुम क्यों यों बह जाते हो?


पर्वत के अन्यमनस्क मन में छाने को,

अटपटे ऊँचे शिखर से उतावले होकर 

नीचे धरती पर उतरने को, 

पत्थरों को भीगाने को,

उनके सोये-खोये ह्रदय को झकझोर देने को,

राहों में बेफ़िक्री से तने हुए छोटे-बड़े पौधों को

कलकल-छलछल भावों  से भर कर ढाढ़स देने को, 

सजलता से उत्फुल्ल कर देने को,  

घाटियों की धमनियों को छू कर 

स्वयं तरल हो जाने को,

उनकी मोड़ों की मनभावन करवटों पर

फिसल-फिसल कर बढ़ जाने को, 

बीहड़ वन की नीरवता को

जीवन का रोर-शोर देने को

तुम यों छहर जाते हो? 

तुम यों फहर जाते हो ? 


बोल निर्झर, बोल, तुम क्यों यों बह जाते हो?


मूकता भी बोलती है,

सच कहूँ ,बहुत बार वो वाचाल होती! 

सौंदर्य तेरा मूक या वाचाल है? 


बोल निर्झर, बोल, तुम क्यों यों बह जाते हो? 


सतीश 

नबम्बर 16/नबम्बर 26 2024. 


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