दिल्ली
दिल्ली
जब सभ्यता
ऊँघती, अनमनी होती है,
वह दिल्ली होती है!
जब संस्कृति
वसन पर वसन पहन कर
मदहोश निर्वसन बनी रहती है,
वह दिल्ली होती है!
जब व्यवस्था
ऊँची प्रतिज्ञाओं की “कट्टरता” से,
धर्म के श्वेत उच्चारों से,
संस्कृति की मोहक नारेबाज़ी से
मान-भरी यमुना को गंदा करती रहती है,
वह दिल्ली होती है!
जब क्रांति की तबीयत
मद-मोद से मत्त होती है,
मुफ़्त के आवेग-संवेग से
भरी-भरी, फिसलती-मचलती होती है,
वह दिल्ली होती है!
जब पत्रकारिता
पल, बे-पल किराये की क्रीड़ा-क्रिया में
प्रसन्नचित्त होकर टहलती-बूलती है,
प्रायोजित होकर मर्यादा की माप गढ़ती है,
वह दिल्ली होती है!
जब योजना
पंचवर्षीय होने से आरम्भ होती है,
फिर शतकीय होने की अवस्था को
सहर्ष हासिल कर लेती है,
वह दिल्ली होती है!
जब नीति
स्वयं तो हरी-भरी, चौड़ी, फैली,
पसरते तन, व्याकुल मन से दुरुस्त होती है,
पर, गाँव और छोटे शहर तक जाते-जाते,
देश की नसों में पहुँचते-पहुँचते
पीली-ढीली रह जाती है,
वह दिल्ली होती है!
जब यंत्र-तंत्र की मोहिनी छवि
कर्मवीर मोहन होना चाहती है,
पर, चंचल आमोद-प्रमोद, निरीह आवेशन,
सतही सम्मोहन बन कर रह जाती है,
वह दिल्ली होती है!
-सतीश
अक्टूबर 16, 2024
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