कुछ-कुछ

कुछ-कुछ (मन की उष्मा लिए)

“तरल स्मृतियों  के बुलबुले सघन से हो गये हैं,

भावनाओं की परिधियाँ पास-पास पड़ी हैं! 

फेनिल यादें परत-दर-परत अन्यमनस्क लेटी हैं! 

मन की उष्मा लिये चाय सी!” ( तप्त पेय सी)

- सतीश

मार्च 11, 2024. 

कुछ-कुछ (अटकी कलम) 


कलम कुछ अटकी-अटकी सी है
बेचैन हवा में साँस लेती सी,
उँगलियों के बीच  
यादों में चुपके ठहरी सी ! 

वह काग़ज़ पर टिकना भूल गई,
मन का ठिकाना ढूँढते-ढूँढते! 
कहीं रम कर वह बिसर गई 
भावों को कहते-कहते! 

- सतीश
मार्च 15, 2024

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

आतंकवाद की शैली

बहुत बार

तुम, भोर के विन्यास सी!