वो शांतमना रात !
वो शांतमना रात !
ये रात क्यों सर्द हुई?
नाहक ही यों बेदर्द हुई !
वो अनमनी, बेफ़िक्र, सयानी हो गई,
कुछ तीक्ष्ण, कुछ तल्ख़ हो गई!
या, यों कहूँ कि
अग-जग की गहरी, ठहरी पीड़ा,
उसके सर्द रोर-शोर,
तुमुल रव को पी-पीकर
शांतमना रात स्वयं स्याह होती गई,
अनजाने ही गहरी काली हो गई!
क्या उसकी पीड़ा से विभोर होकर
प्रकृति भोर को ले आती है?
संसार को नई गूँज सौंप देती है,
नव रंग, नई लालिमा, नई भेंट दे देती है!
फिर, लोग कह उठते हैं, -
नवगीत मिला, नव गात, नव गान मिला!
प्रकृति का नया अवदान मिला !
⁃ सतीश
दिसम्बर 6, 2025
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