बहुत बार
बहुत बार
जब कविता को तन देता हूँ, मन देता हूँ,
पोशाक पहनाता हूँ,
एक अनुभूति चुपचाप उठती है कि
भीतर ही भीतर
कुछ अर्द्धनग्न, नग्न सा हो गया;
बहुत बार !
अंतस् के गहरे विन्यास में मानो
कुछ उघड़ गया, उघड़ता गया,
कुछ छिल गया, छिलता गया बार-बार,
बहुत बार!
क्या यह मनुष्य बनने की क्रिया है?
मनुष्य बनते रहने की प्रक्रिया है?
छुअन के चिन्ह बड़े होते हैं,
पर, अछुअन के चिन्ह और भी बड़े होते हैं,
बहुत बार!
अभिव्यक्ति बड़ी होती है,
पर, जो अनकहा रह गया,
उसकी उमेठती ऊर्मियाँ और भी सघन, तीक्ष्ण होती हैं,
बहुत बार!
⁃ सतीश
मार्च 1, 2025
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