क्या करूँ ईश्वर ?
क्या करूँ ईश्वर ?
क्या करूँ, ईश्वर?
ज्ञान पूरा है नहीं,
भक्ति भी अधूरी ही है,
संशय सघन बना रहता है,
वो बार-बार डुबो देता है!
पर, ऐसे में जो कुछ है,
छोटा-बड़ा, लघु-अलघु,
श्वेत-श्याम, निम्न-अनिम्न,
न्यून-अन्यून, ग्रस्त-अग्रस्त,
श्रेष्ठ-अश्रेष्ठ, सिक्त-असिक्त,
आसक्त-अनासक्त, कुंठा-अकुंठा-
सबकुछ तेरे चरणों पर धर देता हूँ!
क्षमा करना! नमन और नमन!
-सतीश
मार्च 9, 2025
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