अनुभव

“अनुभव” के भव, प्राय:, “अनु” नहीं होते,

 वे भाव-भवों से, भव-भावों से भरे-भरे होते हैं! 


 उनकी मिट्टी जीवन से सनी होती है, 

 उसपर अनगिनत पहाड़, नदी, समुद्र 

 टापू-टीले और तट होते हैं;

अनेकानेक रेत तने होते हैं, चाहे-अनचाहे 

 विशद रूप से दूर-दूर तक फैले होते है!

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