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माँ

 माँ  - जेठ माह (सन् 1423), शुक्ल-पक्ष, परिवा-उपरांत द्वितीया,  सोमवार, आर्द्रा-नक्षत्र ।  उस दिन पहली बार मैनें माँ को  अस्वाभाविक रूप से चुप देखा था।  पहली बार मैंने माँ को यों रहस्यमयी देखा था! पहली बार मेरी माँ विचारविमुक्त थी, पहली बार वह हमारे प्रति अनासक्त थी, पहली बार वह आँसुओं को स्वीकार नहीं कर रह थी ।  बहुत दिनों के बाद, पहली बार लगा था  कि बीमारी पीछे छूट गई और  माँ ऊपर उठ गई!  माँ एक नई तीर्थयात्रा पर निस्पृह निकल गई थी, वह शुभ्र, शांत, समुज्जवल, समाधिस्थ थी, हम निरीह, निरुपाय, निमज्जित, निष्प्राण, नियति-अस्त थे।  माँ हमारा आयतन थी, हमारा विस्तार थी।  छोटे क़द और हल्की काया में  एक महासागरीय कोशिश अपरम्पार थी, वह सभी कठिनाइयों में अडोल कील बनी रहती थी ।  वह कश्ती थी, किनारा भी थी, मूल थी, उच्चतम-शुचितम सिरा भी थी।  वह हमारी आस थी, मान थी, पूरा-पूरा आसमान थी, रात में तपी, दिन में जली, वह धुनरत, समग्र दिनमान थी।  माँ स्वयं एक जीवन थी, जीवन की शैली भी थी, अशर्मशील अनादरों के विरूद्ध मर्यादा कठोर थी...