माँ
माँ
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जेठ माह (सन् 1423), शुक्ल-पक्ष, परिवा-उपरांत द्वितीया,
सोमवार, आर्द्रा-नक्षत्र ।
उस दिन पहली बार मैनें माँ को
अस्वाभाविक रूप से चुप देखा था।
पहली बार मैंने माँ को यों रहस्यमयी देखा था!
पहली बार मेरी माँ विचारविमुक्त थी,
पहली बार वह हमारे प्रति अनासक्त थी,
पहली बार वह आँसुओं को स्वीकार नहीं कर रह थी ।
बहुत दिनों के बाद, पहली बार लगा था
कि बीमारी पीछे छूट गई और
माँ ऊपर उठ गई!
माँ एक नई तीर्थयात्रा पर निस्पृह निकल गई थी,
वह शुभ्र, शांत, समुज्जवल, समाधिस्थ थी,
हम निरीह, निरुपाय, निमज्जित, निष्प्राण, नियति-अस्त थे।
माँ हमारा आयतन थी, हमारा विस्तार थी।
छोटे क़द और हल्की काया में
एक महासागरीय कोशिश अपरम्पार थी,
वह सभी कठिनाइयों में अडोल कील बनी रहती थी ।
वह कश्ती थी, किनारा भी थी,
मूल थी, उच्चतम-शुचितम सिरा भी थी।
वह हमारी आस थी, मान थी, पूरा-पूरा आसमान थी,
रात में तपी, दिन में जली, वह धुनरत, समग्र दिनमान थी।
माँ स्वयं एक जीवन थी, जीवन की शैली भी थी,
अशर्मशील अनादरों के विरूद्ध मर्यादा कठोर थी।
माँ जीवन के कर्म-अर्थों का सार-सूत्र, सूत्रधार
और सरलतम व्याख्या थी,
दुनियाई आग-आँच-आफत-आतप से हमें बचाती
एक अभेद्य, अशर्त आँचल भी थी!
माँ, तुम देवी तो नहीं थी!
देवी-देवताओं की तरह पत्थर और पत्थरीली नहीं थी,
तुम अगोचर, अदृश्य, अस्पृश्य, अप्राप्य,
अतप्त, अस्पष्ट नहीं थी!
तुमसे आकर मैं बढ़ा हूँ,
तुमको पाकर मैं चढ़ा हूँ,
तुम्हारे स्पर्श के आशीष से मढ़ा हूँ।
सच है, माँ, तुम देवी तो नहीं थी,
देवी-देवताओं की तरह पत्थर और पत्थरीली नहीं थी!
पता नहीं, देवता इतने अनजाने, अनमने, अन्यमनस्क,
अशब्द क्यों होते हैं?
देवी-देवताओं के ऊपर एक विराजमान पायदान है,
माँ, तुम वहाँ बैठी एक सवाक्, सदेह, साक्षात्,
सप्रत्यक्ष, सुप्राप्य शक्ति हो।
तुम उसकी पूजा हो, प्रसाद हो, चन्दन हो,
विनती हो, आरती हो।
माँ, तुम एक शाश्वत महावाटिका थी,
जहाँ हम बेसुरे चहक लेते, भूल-भटक लेते,
फिर, वापस आकर, एक साँस में इठला भी लेते।
अब हम तुम्हारी यादों को पी लिये,
फिर, आती-जाती भूखी औपचारिकताओं की ओर हो लिए,
कभी तुम्हारे साथ आँसुओं में टहल लिए,
जहाँ-तहाँ अपने कर्त्तव्य में फाँक-चूक का मलाल लिए!
अब तो धुरी ही हमसे दूर चली गई,
हम अपने धड़ों को समझने-समेटने में लगे हैं !
हमारी यादों में “ या” अधिक है, या “और” अधिक है,
हम फिर से अपने आप को पहचानने में लगे हैं!
माँ के पास एक कर्मशील ज़िन्दगी अनन्य रही,
हमारे हिस्से की ज़िन्दगी, अधिकांशतः, कर्म-शून्य रही!
माँ और बेटे के बीच यही फ़र्क़, यही फ़ासला है
कि माँ तुमने मुझे जन्म-जीवन दिया, पूरा-पूरा जीवन दिया,
और, मैं! तुम्हें एक कविता दे रहा हूँ!
माँ और बेटे के बीच यही फ़र्क़, यही फ़ासला है!
X X X
मेरी माँ कहाँ होगी?
परिभाषित रूप से माँ बहुत पढ़ी-लिखी नहीं थी।
पर, जीवन को सीधे-सीधे गहराई में देखना जानती थी,
जीवन के मूल को पकड़कर उसको
भविष्य-वितान तक तान देना चाहती थी;
जहाँ-जहाँ विद्वता किसी भूल-भुलैये में
थोड़ा भटक जाती होगी,
जहाँ-जहाँ एक महान् कविता थोड़ी पीछे छूट जाती होगी,
जहाँ-जहाँ एक महान् कहानी थोड़ी बौनी हो जाती होगी,
और, एक मनुष्य की कर्मशीलता,
उसकी मनुष्यता थोड़ी ऊँची चढ़ जाती होगी,
वहाँ-वहाँ माँ जीती होगी, जीतती होगी!
पूजा तो मैं अब भी करता हूँ ।
पर, हर पूजा में मन पूछता रहता है - माँ कहाँ होगी?
इसी प्रश्न के मुहाने पर अविश्वास, अस्वीकार, अवज्ञा
कौंधते रहते हैं।
जिसने एक धर्मशील-कर्मशील ज़िन्दगी जी हो,
उसे ऐसी बीमारी क्यों ?
ऐसा-इतना कष्ट क्यों ?
मन से एक उत्तर टहलता आता है -
शायद, इसलिए कि मौत को भी सीधे-सीधे
माँ तक आने में हिचक थी, शर्म थी!
संभवत:, यही उसकी बीमारी का, उसके कष्ट का
नियतिबद्ध धर्म-प्रयोजन था!
हरेक पूजा में मैं पूछता रहता हूँ -
पूजा करना मनुष्य की विवशता है?
उसकी थकावट की पद्धति है?
या, सृष्टि की प्रथम-प्रधान शक्ति के
नैसर्गिक स्वीकार की नियति है?
मृत्यु के मुँह में बैठकर भी
माँ किसी की बेटी की शादी के लिए कुछ करना चाहती थी।
कुछ करने को हमें बार-बार कहती रहती थी,
कभी सामाजिक तरीक़ों के प्रति हमें शिष्ट
होना सिखाती रहती थी।
ऐसे में लगता है -
मृत्यु के सिरहाने लेट कर भी
यम के चरित्र को थोड़ा फीका बनाती हुई
जहाँ-जहाँ एक साधारण-से मनुष्य की
कर्मशीलता, उसकी मनुष्यता हँसती होगी,
वहाँ-वहाँ माँ जीती होगी, जीतती होगी!
फिर, वही प्रश्न कि मेरी माँ कहाँ होगी?
लगता है -
वह किसी परशुराम के निर्विकार,
सकर्मक कुठार की धार बनी होगी।
वह रामेश्वरम् में किसी राम की मर्यादा-रीढ़ बनकर खड़ी होगी,
वह कन्याकुमारी में तीन समुद्रों में घुली हुई
शताब्दियों से मौन पत्थरों को मनुष्य-संवेदना से भीगाती होगी।
वह अयोध्या के सरयू में ससंकल्प समाधिस्थ होगी,
वह प्रयाग के संगम में अनदिखी सरस्वती को
समादर देती हुई,
उज्ज्वल गंगा और श्यामल यमुना के साथ होकर
पूरबायण हो गई होगी।
वह द्वारिका में किसी कृष्ण को
कर्म-संज्ञा की याद दिलाती होगी।
वह पुरी में किसी जगन्नाथ को जगत्-मर्म के समीप खींचती होगी।
वह हरिद्वार में गंगा के जीवन-चरित्र में
उछाल और घर्घराहट भरती होगी।
वह मानसरोवर में भूले-बिसरे शिव को
सृष्टिपरक सच्चे मान-सम्मान की याद दिलाती होगी।
उनके सामने आधे ऊँ और आधे त्रिशूल के स्तम्भ की तरह
बने प्रश्न-चिन्ह-सी खड़ी होगी ।
वह हरेक कर्तव्य के शीर्ष पर
उसे थोड़ा ऊँचा करते हुए टिके रेफ की तरह होगी।
वह हरेक माँ के माथे पर एक गोदमय चाँद बनकर बैठी होगी।
चारों धाम पर टिके कर्म-धर्म, भाग्य-चरित्र,
भूगोल-इतिहास की पूँजीभूत प्राप्ति,
माँ, मेरी माँ, हमारी माँ - कांति, महाकांति, सूर्यकांति !
सतीश
October, 2016
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