नारीत्व का आत्म-बोध !

नारीत्व का आत्म-बोध ! 


मैं हूँ नंदन-वन की पवित्र कलिका,

युग-चेतना के यज्ञ की प्रखर ज्वाला, 

अदमित सपनों की अंतहीन छवि, 

सृजन की सुंदरतम अभिव्यक्ति! 


मरघट के क्रीड़ा-कंदुक, 

अहंकारों, विकारों, वीभत्स सत्ताओं,

अत्याचारों, प्रताड़नाओं के आसुरी तत्व सकल! 

तुम सुन लो प्रकृति का यह अडिग चिंतन

कि रोदन मेरा व्यक्तित्व नहीं,

पराजय मेरा अस्तित्व नहीं! 


मेरी संवेदना के सुर-स्वर

अग-जग में चारों ओर छाये रहते हैं! 

मेरे विराट आनन पर  

जीवन के सब ऐश्वर्य उजलते रहते हैं,

मेरे कानन-कुंडल में 

सृजन और संहार समवेत स्पंदित होते हैं! 

मेरी आँखों में आकर 

युग के सारे स्याह-बोध भी 

तरल-तीक्ष्ण सौंदर्य-अंजन बन जाते हैं;


मेरी भृकुटी की वक्र भंगिमाओं से

दुनिया के निकृष्ट पाप भस्म होते हैं, 

मेरी पलकों में शक्ति के मर्म थिरकते रहते हैं,

मेरी साँसों में अपराजेय काल-भाव सतत् बहते रहते हैं,

मेरे अधरों पर जीवन के विशद चिन्ह बसे होते हैं,

मेरी ग्रीवा के घुमावों में शिवा-सेव्या के तेवर झलकते रहते हैं! 


मेरे ह्रदय-पटल पर 

उदात्त करुणा, पीड़ा, प्रेम, वात्सल्य

बारी-बारी से उठते-जगते हैं,

युग-तप-ताप समग्र नैसर्गिक रूप से

पल-पल अँखुआते रहते हैं,

मेरे आँचल की सिहरन पर 

सृष्टि की पुनीत समर्थता हिलती-डुलती है, 

मेरे पग की चापों में 

मानवता की निष्ठा की मानक छाप पड़ी होती है! 


सतीश 

अप्रैल 13, 2025 






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