वो मुस्कान
वो मुस्कान
वो मुस्कान
समय के पंखों सी फैल गई,
फिर, स्वयं समय हो गई;
वो साँस में बह गई, उसकी सह्रदय गति हो गई,
स्वयं साँस हो गई;
वो आनन के विस्तार को टोहती रही,
स्वयं अपरिमेय आनन हो गई;
वो रोम-रोम में भर गई, स्वयं रग-रोम हो गई;
वो मन में रम गई, स्वयं मन हो गई;
वो जीवन में बस गई, स्वयं जीवन हो गई!
वो मुस्कान !!
-सतीश
जून 6, 2025.
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