भीतर के तम से

भीतर के तम से 

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बाहर तर्कों की भीड़ लगाता रहता हूँ,

अरोक बहस में अटोक पड़ा रहता हूँ,

विवरण, विश्लेषण अनवरत जारी रहता है,

युद्ध जारी रहता है;

बात सच्ची तो तब होगी,

बात सुंदर तो तब होगी, 

शिवमय-शिवलय तो तब होगी

जब अपने ही मन के फलकों पर छाये हुए घने तम को

सीधी दृष्टि से देख लूँ, 

थोड़ा ही सही पढ़-परख लूँ, 

उसकी बनावट को, बुनावट को समझ लूँ, 

हो सकता है, तो, एक लघु संघर्ष कर लूँ,

कम-से-कम प्रतिरोध का क्षुद्रतम प्रयास भर कर लूँ! 


सतीश 

मार्च 25, 2025


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