तन से नहीं, मन से

तन से नहीं, मन से 


जानता हूँ, तुम तन से परे हो, 

तुम सरहद,  सरहदों की हदों के पार हो,

हो सकता है इसलिए कि 

तुम प्यार हो, 

प्यार से भरा प्यार हो! 


तुम्हारे हर शब्द को चूम लेता हूँ,

तन से नहीं, मन से! 

उसकी हर भंगिमा से लिपट जाता हूँ,

उसके भावों में तैरता रहता हूँ,

छुअन और अछुअन के चिन्ह खोजता रहता हूँ,

निरंतर, अनवरत, अनथक, अरोक, 

तन से नहीं, मन से। 


या, फिर, सच कहूँ,

तन से भी, मन से भी! 


सतीश 

मार्च 31/अप्रैल 2, 2025


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

आतंकवाद की शैली

बहुत बार

तुम, भोर के विन्यास सी!