भोर से शाम तक, जीवन तक !
भोर से शाम तक, जीवन तक !
पहले,
खिलती हुई, खेलती हुई,
मुक्तमना, उन्मुक्तकेशी, आत्म-विभोर
भोर लाल-लाल होकर आई!
फिर,
चीड़ और ताड़ के लम्बे पेड़ो्ं के पार
दूर क्षितिज पर
कुछ कहीं भूली, कुछ कर्तव्य में अटकी
शांतमना, धीरवती साँझ
जाते-जाते स्निग्ध लालिमा दे कर चली गई!
बीच में थीं,
सारी तपतपाहटें, तिलमिलाहटें, चिलमिलाहटें,
उष्ण-शीत भाग-दौड़, लघु-अलघु आहटें,
सारे रोर, शोर, घात-आघात, प्रतिघात,
वाद-विवाद, ख़ेमे-खाँचे,
अंतहीन तर्क-सुतर्क-कुतर्क, पैंतरे, पायदान!
बीचोंबीच थे
ये सारे तत्व, सारे अवयव
हम उन्हें जीवन कहते हैं!
⁃ सतीश
अप्रैल 18, 2025.
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