सागर की लहरों में ( भाग -दो)

सागर की लहरों में

( भाग -दो) 


सागर की लहरों में मैंने 

तुमको आते-जाते देखा,

कभी जग-पीड़ा से मथित, 

कभी भाव-रसा के आँचल सा फैलते देखा; 

कभी संवेदना से सरकते, 

कभी वेदना से विह्वल हो सरल, तरल होते देखा;

कभी व्यक्तित्व की घूर्णियों में 

संसार-सार के सम-विषम को गुंफित करते,

कभी उन्हें सहर्ष प्रसरित करते देखा; 


कभी हास-परिहास से निखरते,

कभी सहज संवेगों में अमंद बहते,

कंपित, कंटकित, तरंगित होते देखा; 

कभी कंकर-पत्थर को विभोर करते,

कभी सीप-शंख के वलय-लय में 

चेतन भावों के मर्म को सहेजते देखा; 

कभी लोल, ललित लहक-लीला बनते, 

कभी लास-रास में ठुमकते, झूमते देखा! 

कभी संत-सत्व में समाहित, रमते,

कभी विलास-मोद में विहरते देखा; 

     

       सागर की लहरों में मैंने 

       तुमको आते-जाते देखा! 


कभी सूर्य-किरणों के साथ छलछल, छमछम करते,

कभी चाँदनियों को चुमकारते देखा; 

कभी स्मृतियों में गहरे गोता लगाते,

कभी विस्मृति में बेसुध खो जाते देखा;

कभी समर्पण बन सविनय झुकते, 

कभी विविध शक्ति-विधाओं में उठते, जगते देखा; 

कभी अरूप-रूप में सँवरते, 

कभी दृश्य-अदृश्य प्रकृति बनते देखा; 


सागर की लहरों में मैंने 

तुमको आते-जाते देखा! 


सतीश 

सितम्बर 21/25, 2025 


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