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राजनीति और साहित्य

मैं   कभी   नहीं   कहता   कि   राजनीति   छोटी   होती   है ; हाँ ,  बार - बार   कहता   हूँ   कि   साहित्य   की   दृष्टि   बड़ी   होती   है !  और ,  जब - जब   साहित्य - दृष्टि   संक्षिप्त   होती   है , निश्चित   ही ,  भीतर - ही - भीतर ,    कहीं - न - कहीं   वह   अपने   आपसे   से   रहित   होती   है ,  रिक्त   होती   है !  - सतीश   Jan 14, 2023. 

कविता क्या करेगी?

अरे भाई, कविता क्या करेगी?  वह फूलों-पत्तियों-कलियों-पंखुड़ियों से अपने बिम्बों-प्रतिबिंबों को सजाती रहेगी? वह चाँद-चाँदनियों की राग-रंग-रेखाओं से निरन्तर खेलती रहेगी? वह भावमय भोर के आँगन में  प्रेममय अठखेलियाँ करती रहेगी?  या, समय-क्षितिज पर कभी कर्म, कभी कर्म-स्वेद, कभी कर्म-केन्द्र  बनकर उपस्थित रहेगी? अरे भाई, कविता क्या करेगी? वह भीष्म-पितामह, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य बनकर धर्म का आलाप करेगी; पर, व्यक्तिगत प्रतिज्ञाओं से बँधकर  अधर्म की रक्षा में युद्ध करेगी?  या, विदुर बनकर सत्धर्म की सलाह पेश कर  संन्यास ढूँढने चली जायेगी? या, शंका बनकर अर्जुन को कोसेगी? या, अर्जुन के गांडीव की गति-मति बनेगी?  या, श्रीकृष्ण बनकर प्रतिज्ञाओं के मान-मानदंडों की नई भाषा-परिभाषा रचेगी? और, सुदर्शन-चक्र धारण कर नया कर्म-दर्शन गढ़ेगी?  अरे भाई, कविता क्या करेगी? वह दुनिया के रावणों की विद्वता पर मुग्ध होगी? वह तर्कों-तथ्यों-सूचनाओं, बहस-विवरणों-विश्लेषणों  के दाँव-पेंच की भंगिमाओं-मुद्राओं, प्रपंच-प्रलापों में मस्त-व्यस्त रहेगी? या, श्रीराम के कर्म-धनुष ...

खादी से कलम तक

पाँच वर्ष की कमाई का मौसम है,  सही-ग़लत देखना विषम है।  सम-सम्यक् है, ज़हर फैलाना, कभी इधर,कभी उधर से,आग लगाना। यही राज है,यही नीति है, खादी से कलम तक की  यही दारुण रीति है।  सोचा था, खादी के श्रेष्ठ सूत के सुंदर तत्व कलमों में समा जायेंगे, फिर, कलमें बड़े भाव से आसक्त होकर बोलेंगी, देश-समाज की रिक्त भावनाओं को उच्च संभावनाओं से भरेंगी !  पर, खादी के वादे कहाँ गये? कलमों की क़समें कहाँ गईं? ऊँचे-ऊँचे सपनों के नारे, तेज-तर्रार, फुर्तीले, आदर्श-सिक्त मुहावरे, किस ओर मुड़े, किस ओर गिरे?  किस ओर झुके, किस ओर ढले?  कलमें अपना अस्तित्व भूल गईं, अपनी बोली, अपने तेवर, अपने रूप  अपनी स्थापनाओं के आधार, अपनी छवियाँ भूल गईं।  खादी और कलम की ऐसी एकता, उनका एकवर्णी, लयमय चरित्र  प्रजातंत्र के बड़े अपराधों में एक है; प्रजातंत्र की अनेकताओं के बीच  ठहरी  यह गहरी शून्यता  है!  खादी वाले, तुम सूत-सूत को देश-प्रदेश, लोगों के स्व और  जीवन-अर्थों से ऐसा बाँधो कि  वही तुम्हारा “स्वार्थ” हो जाये!  जग में कलम उठाने वालों! अपन...