पाँच वर्ष की कमाई का मौसम है, सही-ग़लत देखना विषम है। सम-सम्यक् है, ज़हर फैलाना, कभी इधर,कभी उधर से,आग लगाना। यही राज है,यही नीति है, खादी से कलम तक की यही दारुण रीति है। सोचा था, खादी के श्रेष्ठ सूत के सुंदर तत्व कलमों में समा जायेंगे, फिर, कलमें बड़े भाव से आसक्त होकर बोलेंगी, देश-समाज की रिक्त भावनाओं को उच्च संभावनाओं से भरेंगी ! पर, खादी के वादे कहाँ गये? कलमों की क़समें कहाँ गईं? ऊँचे-ऊँचे सपनों के नारे, तेज-तर्रार, फुर्तीले, आदर्श-सिक्त मुहावरे, किस ओर मुड़े, किस ओर गिरे? किस ओर झुके, किस ओर ढले? कलमें अपना अस्तित्व भूल गईं, अपनी बोली, अपने तेवर, अपने रूप अपनी स्थापनाओं के आधार, अपनी छवियाँ भूल गईं। खादी और कलम की ऐसी एकता, उनका एकवर्णी, लयमय चरित्र प्रजातंत्र के बड़े अपराधों में एक है; प्रजातंत्र की अनेकताओं के बीच ठहरी यह गहरी शून्यता है! खादी वाले, तुम सूत-सूत को देश-प्रदेश, लोगों के स्व और जीवन-अर्थों से ऐसा बाँधो कि वही तुम्हारा “स्वार्थ” हो जाये! जग में कलम उठाने वालों! अपन...