कविता क्या करेगी?

अरे भाई, कविता क्या करेगी? 

वह फूलों-पत्तियों-कलियों-पंखुड़ियों से

अपने बिम्बों-प्रतिबिंबों को सजाती रहेगी?

वह चाँद-चाँदनियों की राग-रंग-रेखाओं से

निरन्तर खेलती रहेगी?

वह भावमय भोर के आँगन में 

प्रेममय अठखेलियाँ करती रहेगी? 

या, समय-क्षितिज पर कभी कर्म,

कभी कर्म-स्वेद, कभी कर्म-केन्द्र 

बनकर उपस्थित रहेगी?


अरे भाई, कविता क्या करेगी?

वह भीष्म-पितामह, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य बनकर

धर्म का आलाप करेगी; पर,

व्यक्तिगत प्रतिज्ञाओं से बँधकर 

अधर्म की रक्षा में युद्ध करेगी? 

या, विदुर बनकर सत्धर्म की सलाह पेश कर 

संन्यास ढूँढने चली जायेगी?

या, शंका बनकर अर्जुन को कोसेगी?

या, अर्जुन के गांडीव की गति-मति बनेगी? 

या, श्रीकृष्ण बनकर प्रतिज्ञाओं के मान-मानदंडों की

नई भाषा-परिभाषा रचेगी?

और, सुदर्शन-चक्र धारण कर

नया कर्म-दर्शन गढ़ेगी? 


अरे भाई, कविता क्या करेगी?

वह दुनिया के रावणों की विद्वता पर मुग्ध होगी?

वह तर्कों-तथ्यों-सूचनाओं, बहस-विवरणों-विश्लेषणों 

के दाँव-पेंच की भंगिमाओं-मुद्राओं, प्रपंच-प्रलापों में

मस्त-व्यस्त रहेगी?

या, श्रीराम के कर्म-धनुष पर बैठकर

सकर्मक संज्ञाओं का संधान करेगी? 


और, कर्म की शक्ति-देवी की पूजा कर

अन्तर्मन के दीपों की ज्वाला बन कर,

डूबते-डूबते भी कर्मरत सूरज के पुनीत 

मन-रूप को पूज कर

उगते कर्म-सूर्य की अगुआई में, नमन में

अर्पित-समर्पित होती रहेगी? 


अरे भाई, कविता क्या करेगी? 


सतीश 


Nov 17, 2020.

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