ऐसा ही क्यों

            

             

ग्रंथों-पुस्तकों को ही नहीं,

जीवन को पढ़ते हुए,

जीवन को सीधे-सीधे जीते हुए,

बाहर-भीतर के सूत्रों को बाँधते हुए,

समझना चाहता हूँ कि

 

पर्वत की छाती क्यों फूली है?

नदियों को बहने की आदत क्यों लगी है?

विशाल समुद्र भी तट पर

बेचैन क्यों हो जाता है?

फूलों को खिलने-मुस्काने की 

प्रवृत्ति कैसी मिली है?

काँटों को चुभने की लत

क्यों लगी है?

आसमान को नीला-नीला रहने की

ज़िद्द क्यों पड़ी है?

धरती को अच्छा-बुरा, ठोस-तरल, 

आग-राग - सबों को धरे-समेटे रहने की

मनोवृत्ति क्यों मिली है?


यों, इन तत्वों-तारों को

हिगराते-सुलझाते हुए,

अपने आप को

खोजते-खँगालते-माँजते रहने की

कोशिश में पूछता रहता हूँ -

ऐसा ही क्यों?



                                      - - सतीश 

                                        21 - दिसंबर - 2020. 







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