सत्ता का आग्रह
अक्सर, हमारी व्यवस्था में,
सत्ता के घोषित उजले-धवल घरों में
स्वार्थ-अहम्-प्रपंच के ग्रह-तारे बसे हैं,
पद-पैसे-पहुँच के
अनियंत्रित तृष्णा-तेवर
स्वत्व-साधना के पैने अस्त्र-शस्त्र बने हैं;
मर्यादा के भंजन-मंत्र
शक्ति-संचय के मेरुदंड बनकर तने हैं,
संकुचित स्व की संज्ञाएँ उपलब्धियों के
बेडौल आयाम, आकृति, आयतन गढ़ती हैं!
सत्ता का ऐसा अतिशय आग्रह,
वस्तुतः है भयकारी दुराग्रह;
वह नेतृत्व-नायकों की है
भम्रित, कलुषित, हेय प्रज्ञा !
आसमान चिल्ला-चिल्ला कर
अपनी उच्चता का उद्घोष नहीं करता,
धरती अपनी व्यापकता के
प्रचार हेतु छाती नहीं पिटती,
सागर नाद तो करता है, मगर
वह थमना-थिरना,
ठहरना-सँभलना भी जानता है,
शीत-समय में वृक्ष सिर नहीं धुनते।
सच तो यह है कि
‘विपक्ष’ के अस्तित्व में भी
एक दमदार ‘पक्ष’ अन्तर्निहित है।
सच्ची सत्ता मर्यादा, मर्यादा-अनुपालन है,
निरर्थक तर्क-वितर्क का मिथ्या-जाल नहीं;
सच्ची सत्ता कर्म-नियत की स्वच्छता है,
निरंतर घोष-घोषणाओं का नर्तन नहीं,
सच्ची सत्ता व्यर्थ गर्जन-तर्जन नहीं,
संकीर्ण मन-मानस का रोग नहीं;
सच्ची सत्ता का आग्रह
जन-गण के लिए कर्म-योग,
शालीन मनोयोग है।
- सतीश,
10 Jan, 2021
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