ये पढ़े-लिखे लोग!

बड़ी संख्या में,

पढ़े-लिखे लोग 

भ्रष्ट नहीं होते, 

सच कहिए, तो,

वे भ्रष्टाचार होते है! 


कई बार,

वे  झूठ का भूगोल-खगोल गढ़ते हैं,

चिंतन-दर्शन, तर्क-वितर्क, विवरण-विश्लेषण 

की  निरंतर पैंतरेबाज़ी के साथ 

वे ऐसे तारे-सितारे आसमान में बसाते हैं 

जिनकी तेज-शक्ति 

वसुधा को न तो भाती है, न लुभाती है।


वे लगे रहते हैं,

सूर्य-चाँद को रोकने-टोकने में;

सूर्य को तिलमिलाता हुआ बताने में,

चाँद को “अकारण शीतल” सम्बोधित करने में;

उनकी कहानी होती है,

हानि-लाभ की सघन आत्म-अभिव्यक्ति ,

सुंदर-सजीले समीकरण की मोहक मनोवृत्ति!


और,

अरे, कलाओं-कविताओं, गीतों-ग़ज़लों का क्या कहना? 

वे भरी सभा में खुलेआम बिकते हैं;

किन-किन की बोली-टोली पर,

किन-किन की आँख-मिचौनी पर,

वे नत-विनीत होकर,

कभी मन से, कभी अनमने होकर

जहाँ-तहाँ, बार-बार 

सोते-जगते, उठते-गिरते हैं! 


सतीश

30 Oct, 2021. 

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