दिनकर
तुम्हारी कृतियों से हमने सीखा-
‘प्रकाश की किरणें सीधी रेखाओं में गमन करती हैं’!
हमने सीखा -
सूर्य अस्पष्ट नहीं होता।
यह भी कि
वह आकाश में क्रीड़ा करना जानता है,
और,
धरती के क्रिया-धर्म को भी पहचानता है।
सूरज की सच्ची मेधा
उसकी उज्ज्वलता का ज्ञान-बोध नहीं,
बल्कि, धरा की माटी-महक तक पहुँचने की
उसकी अनवरत बेचैनी,
अमिट इच्छाशक्ति,
उसकी अडोल नियत है।
चारों ओर,
मेघों के चाहे कितने भी आवरण हों,
सूर्य की किरणें
देश-दुनिया के पोर-पोर को भूलती नहीं,
वे लोक से अलोक तक आलोक-स्तम्भ का
पहरा खड़ा देती हैं,
जीवन के पत्ते-पत्ते में लीन होकर
उन्हें हरा-भरा कर देती हैं,
सृजन-तूलिका से निकल कर
वातावरण की जड़ता को तोड़ने में तुली रहती हैं।
दिनकर की प्रकृति-ज्योति
वादों-ख़ेमे-खाँचों-क्यारियों में
नहीं अटकती,
वह स्वतंत्र रहकर
समय-संघर्ष, जीवन-तत्वों से टकराकर
भूगोल के खंड-खंड में फैल जाती है,
इतिहास की सीमाओं का अतिक्रमण करती है,
सहास-समोद रहकर, सरल-सहज बनकर।
⁃ सतीश
Sept 23, 2021.
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