बादल और बिचौलिये
व्यवस्था के बिचौलिये
बादलों-से होते हैं,
वे धरती की ऊमस-छटपटाहट को
आकाश तक पहुँचने नहीं देते।
वे ज़मीनी सच्चाइयों की धूल,
धुँआ को बटोर,
पूरे आकाश में सरक-सरक कर,
अपने आप को सघन, नम बनाने में
जुटे रहते हैं,
बहुधा, वे धरा पर
बरसना भूल जाते हैं,
वे सूरज की उष्णता को
स्वभाववश समेटते रहते हैं,
फिर, कभी सूर्य के अस्तित्व-बोध को ही
ढँक देते हैं।
-सतीश
5th July, 2021.
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