वे साँसें, वे बातें
मेरी साँसें सच की होनी थी,
पर, वे कभी लाभ की, कभी हानि की
होकर रह गईं,
वे कभी तौल बन गईं,
कभी तराज़ू बन कर रह गईं।
बातें मैंने दिन बनाने की थी,
चर्चाएँ सूर्य गढ़ने की थी,
लेकिन, वे रातें, रातों की सूचियाँ
गिनाने की होकर रह गईं।
इस बीच चाँद को देखता रह गया,
भोली-भाली चाँदनी रात के कोने-कोने में
सरक-सरक कर उजल गई,
अपने जीवन को सच्चे अर्थों में जी गई।
बातें तो मैनें नये-नये क्षितिजों को,
नये-नये आयामों को रचने की थी,
नित्य नूतन जीवन-नावों को बनाने की थी,
लेकिन, वे इसके या उसके चुनाव की
होकर रह गईं।
बातें जीवन की,
जीवन जीने की होनी थी,
पर, वे क़िस्से, कविताओं, कहानियों की,
उनके बनने-बिगड़ने की,
उनके अच्छे-बुरे, उत्तम-अनुत्तम
होने की रह गईं ।
⁃ सतीश ,
Sep 25, 2021.
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