युद्ध और शांति
शांति के मधुमत्त, मदहोश कबूतर उड़ाने वालों!
विचारों से अधिक, धाराओं से सिक्त होने वालों!
मानता हूँ, सामान्यतः,
सर्वोत्तम मापदंडों पर
युद्ध अभीष्ट नहीं।
लेकिन, समय-संदर्भ की पृष्ठभूमि में,
संभव है,
युद्ध अप्रबुद्ध नहीं हो,
वह आवश्यक आवश्यकता भी हो जाये।
गीता के श्लोक
कल्पित शांति की स्वप्न-कंदराओं में नहीं
रचे गये थे,
वे जीवन और मन के
भीतरी-बाहरी युद्धों के तारों को
पहचानते-सुलझाते हुए बने थे।
यह भी भान रहे कि संधि के सूत्र
यदि शक्ति के दमदार तत्वों से जुड़े-गुँथे न हो,
तो, वे प्राय: निरीह-निरुपाय होकर बिखर जाते हैं;
युद्ध-क्षेत्र को पीठ दिखानी वाली मान्यताएँ
न तो विश्व-व्यक्तित्व बनाती हैं,
न विश्व-नेतृत्व बनती हैं।
इतिहास की त्वचा पर पड़े
जय-पराजय के चिन्हों, दागों को पढ़ लो,
भूगोल के आँसुओं, तापों-अनुतापों को परख लो,
मानचित्रों-चौहद्दियों की प्राण-कथाओं को गुन लो!
अग-जग के
शांति-स्तूपों, जातक-कथाओं,
सभ्यता-संस्कृति के मूल्य-प्राणों,
गाँधी के चरखों, सूतों, तकलियों की रक्षा के लिए
शक्तिधारिणी की साधना कर लो,
मर्यादा-मूल्यों से भरे तीर-धनुषधारी को आराध लो,
और, हो सके तो,
किसी सुदर्शन-चक्रधारी को साथ ले लो।
-सतीश
27 August, 2021.
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