आज की पत्रकारिता
आजकल, अधिकांशतः,
व्यक्तिपरक आय विचारों-लेखों के
आयतन बन जाती है,
रोटी-स्वार्थों की चौहद्दी
पत्रकारिता की आकृति बनाती है।
प्रश्नों के चेहरे-चरित्र
प्रश्न-चिन्हों के कटघरे में आ जाते हैं,
तर्क-तथ्यों की भंगिमाएँ
आदान-प्रदान की कलाएँ बनी होती हैं,
विचारों की शक्ति
व्यक्तिगत पूजा की आरती,
निजी हेतु की बाँगें बन जाती हैं।
बहुधा, प्रश्नों के शोर-भले बादलों में
सच्चाई की नमी नहीं होती,
बड़े-ऊँचे पर्वत-गण सच्ची निष्ठा से
विहीन होकर शुष्क हो गये हैं,
वे बेतरतीब होकर कभी ऊबड़-खाबड़,
कभी सपाट, कभी नुकीले हो जाते हैं;
दूर-दूर तक फैले रेत में
अब कैक्टस भी नहीं दिखते,
मानसरोवर से लेकर मज़ारों तक
मर्यादाएँ या तो ठिठुर रही हैं,
या दफ़न हो रही हैं!
⁃ सतीश
May 30, 2021.
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