काश हम भी सावन होते!
सृष्टि की शिव-जटा खुली हुई है,
सारे लोक में डमरू बजते हैं,
त्रिशूल पर समग्र काल बैठा है,
आदि नाद समवेत बोलते हैं।
मुक्त उमंग से
बूँद-बूँद है छहर रही,
गलियों में, सड़कों पर,
मेड़ों पर, मुँडेरों पर,
झोपड़ियों पर, महलों पर,
तेज-तप्त समूहों, तम-तोमों पर,
सम-विषम तलों पर,
फूलों-शूलों, तृणों, तरूओं पर,
शुष्क डालों, सेहतपूर्ण शिराओं पर,
आहत, उन्नत जीवन-प्रदेशों पर।
काश, हम भी इतने नादान होते,
ऐसे ही सहज-सरल होते,
ऐसे ही बहते, बरस जाते,
ऐसे ही कुछ बहक जाते,
काश, हम भी कुछ शिव-रूप होते,
समन, साकार, सघन सावन होते !
-सतीश
15 August, 2021.
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