प्रेम

प्रेम! 

(चाहे व्यक्ति से हो,

या कर्म, धर्म, समाज-राष्ट्र से)

उसके होने का पहला अक्षर 

अपने अंश के उत्सर्ग से बनता है

ताकि वह संयुक्त हो सके,

सम्पूर्ण, पूर्ण शब्द बन सके,

सकल अनुभूति, 

भावनाओं का देश,

सुंदर जीवन-सर्ग बन सके। 


सतीश 

Jan 16, 2022. 


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

आतंकवाद की शैली

बहुत बार

तुम, भोर के विन्यास सी!