सूर्य चिंतित क्यों है?
सोचता हूँ, पूछ लूँ ?
सूर्य किस चिंता में लीन है?
पता नहीं,
कहाँ, किस ओर विलीन है?
जग के बड़े हेतु हैं खोज रहे,
उन्नत उद्देश्य हैं पुकार रहे,
पर, वह क्यों चुप, उदासीन है?
भरी दोपहरी में वह
कभी-कभी मद्धिम-सा रहता है,
उसके तेवर मन्द-मन्द पड़े हैं,
ज्वाला बुझी-बुझी लगती है!
दोपहरी का सूरज
तीक्ष्ण होने से हिचकता नहीं;
भले ही उसके आराधक भी
बंद कमरों, अंध गुफाओं में
लुक जायें,
वह कर्म-पथ के कठोर दायित्वों से
अपने आप को अलग नहीं करता।
स्वभावत:, कर नहीं सकता,
कर भी नहीं पाता।
हो सकता है कि धरती की समझ
सपाट, सरल और अधूरी हो,
पर, संभवत:,
जीवन की धुरी के समीप होकर
वह मिट्टी के बोध-मूल्यों से सनी हो,
वास्तविकता से भरी हो!
ऐ सूर्य,
तेरी ओज-तेज भरी किरणें
शौर्य-शीर्ष-प्रतिष्ठा के पहले ही
फीकी हो रही हैं?
क्या शाम अनजानी
धूर्त गति से
निकट आ रही है?
⁃ सतीश
Jan 16, 2022.
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