भारत की जनता!
अनंत छायाओं से छली हुई,
असंख्य स्वप्नों में भुलायी हुई,
बार-बार के वादों से ठगी हुई,
जाति-धर्म की गोटी-बोटी पर,
सत्ता के ओछे समीकरणों से
परस्त, निरस्त, अस्त
भारत की जनता!
छोटी-छोटी आकांक्षाओं के पूरे नहीं होने से व्यथित,
प्रजातंत्र की साकार माया-ममता,
मुफ़्त बिजली-पानी के ठेकेदारों,
हड़तालों-आंदोलनों के व्याकुल खिलाड़ी,
खाये-पिये-अघाये, निरर्थक बादलों से,
आतंक के देशी-विदेशी, अभेद्य जालों से
भ्रमित, ग्रसित,
मान-मर्दित, लुंठित, कुंठित
भारत की जनता!
अन्ना-आंदोलन के श्वेत विचारधारी,
लोकपाल और भ्रष्टाचार के विशेषज्ञ,
आप उन्हें कह लें अध्येता या आराधक,
सभ्य-शिक्षित, सुसंस्कृत,
तकनीकों के पैंतरों से लैस व्यक्तित्व
देश-विरोधी शक्तियों की गलियों में खो गये?
भ्रष्टाचार के भयानक पंजों में,
ऊँचे नायकों की ख़रीद-बिक्री में दबोची हुई,
प्राण तोड़ती व्यवस्था तले कराहती हुई,
विकास की अनबुझ कथाओं-कहावतों में,
आँकड़ों, आकलनों, विवरणों, विश्लेषणों की पहेलियों में,
भूली, भुलाई हुई
भारत की जनता!
ग़रीबों की ग़रीबी के व्यापारी
राजनीति में दिन-रात लगातार धनी हुए,
पैसे के औज़ार सशक्त हुए,
ईमानदारी की गहन घोषणाओं के बीचों-बीच
बड़े-बड़े दलों की टिकटें करोड़ों में बिकीं;
प्रजातंत्र के खुलेपन के अगुआ,
तथाकथित वंशवाद-विरोधी क्षेत्रीय क्षत्रप,
अधिकांशत:, अहंकारों के कुनबे में समा गये,
वे व्यक्ति और परिवार के वंश-दंश के रक्षक हुए;
व्यवस्था, मूलत:, बेपानी हुई!
लुप्त हो गई अपराध और राजनीति की दूरियाँ,
घोटालों की आत्माएँ प्रजातंत्र की प्रज्ञा बनीं,
समाज के “मोती-मरकत” बिकने को उतारू रहे!
शासन-प्रशासन, शिक्षा, चिकित्सा की प्राथमिकताएँ
असहाय भटकती रहीं;
मानसरोवर से मज़ारों तक,
या तो ठिठुर रही, या दफ़न हुई
भारत की जनता!
-सतीश
Feb 19, 2022.
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