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मार्च, 2022 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

ये अरि-वृंत

 समय साक्षी है - सत्ताओं को समय-असमय लग जाती है, कानों पर मोटे मफ़लर चढ़ाने की आदत! बहरी होकर वे सही व्यवहार भूल जाती हैं, फिर, अन्यमनस्क, विक्षिप्त हो जाती हैं! उन्हें डर लगता है  सच से ही नहीं, सच के पोस्टरों से भी; प्रजातंत्र की पवित्रतम संस्थाओं में  उनकी राक्षसी हँसी सभ्यता की दिवारों से  टकराती हैं और क्रूर  चुनौती देती है  मान, मर्यादा, व्यवस्था को, मानवता को ! चुनौती! क्योंकि उन्हें भय है कि  सच की विभा उन्हें ढँक देगी, किसी सूरज की ओज भरी किरणें  उन्हें तिरोहित कर देंगी, सजग जनता के समर्थन का प्लावन  उन्हें दूर फेंक देगा -  अनस्तित्व की ओर!  किसी भी काल-क्षेत्र में, किसी भी भूमि-खंड में, ऐसे व्यक्तित्व  सुंदर  “अरविंद” नहीं होते, वे उच्च भावों, सुंदर संवेदनाओं,  सभ्यता-संस्कृति के अराजक अरि,  अरि-वृन्त होते हैं!  संदर्भ  32 वर्षों के सच का हो,  या शताब्दियों के सत्त्व का, भूल जाती हैं कुंठित सत्ताएँ कि इतिहास की क्रूर आहटों में  वे निर्मम रूप से भूला दी जाती हैं; चाहे-अनचाहे,  यह...

कला-अभिव्यक्ति (2)(TheKashmirFiles) !

The Kashmir Files के विरूद्ध  अनियंत्रित आलोचनाएँ आयीं, अराजक आरोप आये; नकारी शक्तियों के अचूक प्रहार,  तथाकथित उच्च शिखरों की चुप्पी,  बहिष्कारों, दुष्प्रचारों के साथ-साथ  तरह-तरह के हथकंडे खुल कर सामने आये, भिन्न-भिन्न तरकीबों ने अपने चरित्र दिखाये!  समय के नकारात्मक तत्त्व  पूरी कुंठा के साथ व्यस्त हैं! “प्रेम” के अद्भुत “प्रयोग” में  इन्हें परहेज़ है सत्य के अंश से; “शांति” की “साधना” में  हत्या-हत्यारों, बलात्कारों-चित्कारों से नहीं,  उन्हें घृणा है यथार्थ-अंकन, चित्रण, चित्रांकन से; यही उनका भीतरी पट है, चित्र है, चित्रपट है! The Kashmir Files के  ये विरोधी, विदूषक, वीभत्स अवरोधी  नाहक भूल जाते हैं कि  यह पक्ष नहीं, विपक्ष नहीं, एक भीषण, नग्न सत्य, तथ्य है, हमारी आदि-संस्कृति की सृजन-भूमि में मानवता के संहार का एक सवाक् कथ्य है! अंतत:, न्यायालय ने कुप्रयासों को अस्वीकृत किया, जनता ने अथाह समर्थन दिया, पूरे मन से अभिवादन किया; कश्मीर में हुई मानव-त्रासदी के  अपने अबोध को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया,  अभूतपूर्व रूप...

शांति-युद्ध के जादूगर

एक बात तो फिर लौट कर आयी  कि शांति की बड़ी, सुनहरी पहेलियों के पीछे  बैठे होते हैं, युद्ध के निपुण बाज, कलाबाज़!  ऐसा भी होता है कि शांति के दुभाषिये युद्ध की भाषा गढ़ते हैं, उसका मान्य व्याकरण बनाते हैं! “प्रजातंत्र” और “विश्व-हित” के  सुसंस्कृत कबूतरों की शालीन फड़फड़ाहटों में  सुनाई पड़ती हैं उन्मादी युद्ध की भयानक आहटें!  और, मोहक, गोरी अवधारणों में, आकलनों-विवरणों-विश्लेषणों में व्यस्त हो जाते हैं, जग-स्वतंत्रता के विशद स्तम्भ! औरों की जीवन-बलि से, अन्यों के कंधों पर टिकी चिताओं पर  सजती हैं विश्व-नायकों की बेतरतीब कुंठाएँ; दूसरों के रक्त से सन कर गाढ़ी होती हैं, विश्व-पुरोधाओं, प्रणेताओं की असीमित आसक्तियाँ!  ठगी वही नहीं जो  इतिहास-भूगोल की चौहद्दी को नकारती है, बल्कि, वह भी है जो शांति के सूत्रों, शास्त्रों, संगीतों के साथ  तरह-तरह के आश्वासन बुन कर, विश्वास के बेडौल कवच ओढ़ाकर, घृणित स्वार्थों, लहुलूहान सत्ता-समीकरणों के लिए हमको और आपको, मित्रों-सहयोगियों को  युद्ध-ज्वाला में धकेल देती है; और, स्वयं निश्चिंत बनी रहती है, अ...