मैं हिंदी
मैं “तुलसी” की राम-कथा,
मीरा की मोहन-वंदना बनी,
सूरदास के “कन्हैया” की
अपरिमेय, मोहक गति बनी!
“कबीर” की अनगढ़ जीवन-शैली,
मैं रहीम की अक्षय वाणी बनी,
मैं रसखान की अमोल थाती,
विद्यापति का शिवमय गान बनी!
मैं “भूषण” की वीर-छवि बनी,
बिहारी की रीति-कला में सनकर
मैं सरस श्रृंगार, आगार बनी।
भारतेंदु की सजग इंदु-ज्योति में
मैनें देखा - “अँधेर नगरी, चौपट राजा,
टके सेर भाजी, टके सेर खाजा”!
फिर, मेरा मन चित्कार उठा -
“आवहु भारत भाई, भारत-दुर्दशा न देखी जाई"।
मैं “पंत” का प्राण-परिचय,
प्रकृति का सुकोमल संचय
“पल्लव” और “गुंजन” बनी !
प्रकृति के अवयवों को
देख-देख कर मैं गा उठी -
“सुंदर है विहग, सुमन सुंदर,
मानव तुम सबसे सुंदरतम!”
महादेवी के गीतों में बसकर
मैनें भक्ति का अनोखा रूप पहचाना -
“विस्तृत नभ का कोई कोना,
मेरा न कभी अपना होना”!
प्रसाद की “कामायनी” बनकर
सारे जग में मैं कह उठी -
“तुमुल कोलाहल कलह में मैं ह्रदय की बात रे मन”!
गुप्त की धर्म-चेतना से उठकर
पूरे पुनर्जागरण-भाव को जगाती
मैं भक्ति-समर्पित होकर गूँज उठी -
“राम, तेरा नाम ही एक काव्य है”!
और, “यशोधरा” बनकर,
बुद्ध की प्रबुद्ध तपस्या को चुनौती देकर,
आधुनिक नारी-चेतना को आंदोलित-स्थापित कर
मैं अविरल वेदना से पुकार उठी -
“साधु-विराग, विलासी,
आओ, हे वनवासी!”
माखनलाल की “पुष्प की अभिलाषा” को
देश-कर्म से भर कर मैं भारत माँ के
सपूतों का बलिदान बनी;
स्वतंत्रता के स्व और स्वत्व को
खोजती, उमेठती, ललकारती
मैं दिनकर का “हुंकार” बनी;
समय के सीने पर चढ़कर
अभूतपूर्व आत्म-विश्वास से
मैंने उद्घघोषित किया -
“सुनुँ क्या सिंधु गर्जन तुम्हारा
स्वयं युगधर्म का हुँकार हूँ मैं!
और, फिर, मैं बोल उठी -
“पड़ते जिस ओर चरण मेरे
भूगोल उधर दब जाता है”!
बच्चन की “मधुशाला” में विहार
हाला की पीड़ा-मादकता में घुलकर,
मेरे मन की बातें तरल हुईं: -
“कवि साक़ी बनकर आया है,
कविता मेरी मधुशाला “!
“दुख ही जीवन की कथा रही” कहकर भी
मैं जग के युग-संघर्ष में निरत रही और
निराला की “राम की शक्ति-पूजा” बनी;
सकर्मक सकारात्मकता की आशा बनकर
भविष्य को पूरे मन से मैं कहती रही-
“होगी जय, होगी जय हे पुरुषोत्तम नवीन”!
“दुष्यंत” के संघर्ष की आत्मा पाकर
मैं आकंठ पुकार उठी -
“एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो!
और, “मुक्तिबोध” के “अँधेरे में” भी मैं
क्रिया-निपुण व्यक्तित्वों से कहवाती रही:
“पर्चा पढ़ते हुए उड़ता हूँ हवा में,
चक्रवात-गतियों में घूमता हूँ प्रतिपल”!
“नेपाली” की शैली-मस्ती में
मैं सारे जग को बता आई कि मेरे
“रग-रग में इतना रंग भरा
कि रंगीन चुनरिया झूठी है”!
“नीरज” के गीतों में भीग-भीग कर,
झूम-झूम कर मैं गा उठी -
“शोख़ियों में घोला जाये,
फूलों का शबाब, उसमें फिर
मिलायी जाये थोड़ी-सी शराब“!
मैं कभी श्रद्धा-इड़ा, कभी “उर्वशी”,
कभी “उर्मिला”, कभी “विष्णुप्रिया”,
कभी “कनुप्रिया”, कभी “विपथगा” बनी,
कभी “तोड़ती पत्थर”, कभी “विधवा” बनी!
प्रयोगों, प्रगति की वीथियों से गुजरकर
मैं “कलगी, बाजरे की”, “असाध्य-वीणा” बनी,
“नदी के द्वीप”, “बाबा बटेसरनाथ” बनी,
समाज-व्यवस्था की असंगतियों-अँगीठियों में जलकर,
उद्वेलित होकर मैनें बताया - “चाँद का मुँह टेढ़ा है”,
मैं खड़ी हुई - “आत्म-हत्या के विरूद्ध” संघर्ष में!
मैं “पूस की रात” और “कफ़न” बनी,
“सेवा-सदन”, “कर्म-भूमि”, “गोदान” बनी!
मैं जैनेंद्र-रचित “त्यागपत्र”, “जयवर्धन” बनी,
मैं भारत के धवल “रेणु” का
अमोल “मैला आँचल” बनी!
विश्व-साधना के पुनीत यज्ञ में
मैं सजग परिवर्तन की वर्तनी बनी,
सतत् परिवर्द्धन की मानिनी बनी,
देश-विदेश की सृजन-चेतना में लिप्त
मैं “माँ, मन और माटी” बनी!
⁃ सतीश
Sep 5, 2022.
सुंदर 👍😊 #हिंदी
जवाब देंहटाएंबहुत-बहुत धन्यवाद, आपको।
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