एक विचित्र चित्र
एक विचित्र चित्र है?
न जाने कैसी अनूठी लत है?
जिन-जिन चेहरों, चरित्रों पर हमने प्रश्न उठाये,
जिन-जिन “नेह-रूहों” वाली प्रवृत्तियों पर हमने धावे बोले,
वे अचानक हमें बेहद प्यारे हो गये;
उनकी छायाओं की अठखेलियों से
हम अभिभूत हो गये!
उनकी तरह हम भी धर्म से “निरपेक्ष” हो गये!
सजग, सचेत, सोद्देश्य, सात्विक होकर?
या, अप्सरामयी सुविधाओं वाली
समीकरणों की तीक्ष्ण लीला में?
सचमुच, एक विचित्र चित्र है?
या, घनी चित्रमाला है?
न जाने कैसी अनूठी लत है?
देश की कैसी बेचैन रत है?
-सतीश
23 August, 2022.
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें