माँ
हमारी ग़लतियाँ, हमारी भूलें,
हमारे नखरे, हमारी चिड़चिड़ाहट,
हमारे क्रोध-क्षोभ -
ये सब तुम्हारे जीवन-भूगोल के ऊँचे-नीचे टीले हो गये,
तुम्हारे जीवन के क्रीड़ा-कलाप हो गये,
तुम्हारे जीवन-यज्ञ के राग-जाप हो गये!
माँ, तुम प्रकृति की सबसे सुंदर,
सबसे सहज,
सबसे सकर्मक,
सबसे सुज्वलंत आहुति हो!
तुम्हारे कर्म की बाँहें
जीवन-धरती और जीवन-आकाश को आपस में जोड़ती
क्षितिज-रेखा है,
तुम्हारी कर्म-चेतना हर रोज़
ओस की बूँदें बनकर टपकती हैं,
तुम भोर के शरीर में
अपनी धमनियों के रक्त-रेशे, रक्त-राग देती हो,
दोपहरी को
अपने कर्म-ताप की तपतपाहट देती हो,
तुम शाम के सूर्य को
मर्यादा से लाल कर देती हो,
अपनी प्रकृति-प्रवृत्ति से उसे
स्निग्ध, रमणीय-दर्शनीय बना देती हो!
माँ,
तुम शरद् को भविष्य-सृजन के लिए
त्याग-परित्याग सिखाती हो,
तुम शीत को
नयी संवेदना की शीतलता, सुकंपन देती हो,
वसंत की प्रकृति को
सृजन-सौंदर्य से भर देती हो,
तुम ग्रीष्म को
अपने व्यक्तित्व की उज्ज्वलता देती हो,
वर्षा-ऋतु को
अपनी सुंदर नियत की बौछार देती हो!
और, यों,
तुम जीवन के जेठ को भी
आर्द्र छत्र-नक्षत्र, शुक्ल-पक्ष दे जाती हो!
-सतीश
June 6, 2020.
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