थाती के पद-तले

हर ओर,

हम अपनी थाती को तौल-तराज़ू 

पर चढा़ने-उतारने में लगे हैं।

जिनने अपना जीवन ही 

मातृभूमि को अर्पित कर दिया,

हम उनकी नोंच-चोंथ में व्यस्त हैं! 


ऐसा , संभवतः, इसलिए है क्योंकि 

हम अपनी कर्त्तव्यहीनता की कुंठा से 

ग्रस्त हैं, भीतर-ही-भीतर 

अपनी न्यूनता से त्रस्त हैं; 

हमारी क्रियाएँ सिर उठा कर चल नहीं सकतीं,

अपनी रीढ़ पर खड़ी हो नहीं सकतीं,

एक-दो डग-पग भी तरीक़े से रख नहीं सकतीं,

संस्कार, संस्कृति, सभ्यता के बड़े अर्थों को 

अपने चरित्र के व्यक्तित्व में धर नहीं सकती! 


असली, भीतरी सच तो यही है कि

स्वयं का स्वयं से साक्षात्कार 

एक वास्तविक आवश्यकता है- 

अपने आप को सही रूप से आँकने की, पहचानने की,

कुछ आकलन की, कुछ अवलोकन की,

निर्विकार अपनी थाती के पद-तले बैठने की,

सकारात्मक कर्म-धर्म के

छोटे-से-छोटे रूप से ही सही

कुछ जुड़ने की, कुछ बँधने की! 


क्या हम कर सकेंगे, 

इतना भी? इतना ही? 

अपने लिए, अपनी थाती के लिए? 

अपने भविष्य के लिए? 


सतीश 

Nov 20, 2022.

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