वर्षों की बातें
वर्षों की बातें कहानी-सी बन गयीं,
किसी रग से आरम्भ हुईं,
किसी रेशे में बह गईं;
वर्षों की बातें प्रकृति-सी हो गयीं,
हर सुबह जग गयीं
हर शाम ढल गयीं;
वर्षों की बातें नदियों-सी बह गयीं,
न जाने कितने पर्वतों के शीर्षों से होकर
किन-किन वादियों में बस गयीं,
किन-किन घाटियों में रम गयीं!
वर्षों की बातें अपने आप में अथ हो गयीं,
स्वयं ही अंत, स्वयं अनंत हो गयीं!
वर्षों की बातें !
- सतीश
Dec 25, 2022.
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