साँझ
वो साँझ
क्यों ढली थी?
वो तो मनुष्यता-सी स्पष्ट थी!
सच्चे प्यार-सी भली थी!
धरती के ओर-छोर पर,
क्षितिज के कोर-पोर पर
वो चुपचाप क्यों खड़ी थी?
वृहत संदर्भों को ढूँढती
जीवन-मेड़ों पर अड़ी थी?
या क्षणों की मर्यादाओं को टोहती
कर्म-पथ में यहाँ-वहाँ मिली
कुछ यादों में अटकी पड़ी थी?
फिर, वर्षा की हल्की, छरहरी बूँदें
अचानक ही आ गयीं!
नयी जीवन-अगुआई में
फिर रात क्यों नम हुई?
क्यों सहज भीग गई?
शांतमना क्यों बह गई,
चतुर्दिक क्यों फैल गई?
लोक से अलोक तक
चाँद क्या तक रहा था?
बादलों की टोका-टोकी,
तीखे शीत की तेज धार,
घने कालेपन के बीचों-बीच भी
वह क्यों सलोना, शीतल, शालीन बना था?
⁃ सतीश
Dec 7/ Dec 10, 2022
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