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ऊपर उठने की कला

आसमान को छू लेने की धुन में शून्य में स्वयं को खोजते, विशाल भुजाएँ फैलाये  चतुर्दिक दिशाओं को थामे  सम्पूर्णता की खोज में लीन-तल्लीन, कहीं माथे पर कुंडों को धारे, कहीं गोद में झीलों को बसाये, बड़ी-छोटी कंदराओं, सुघड़ घाटियों को  अस्तित्व, आयाम देते हुए  खड़े हैं पर्वत !  पर, ऊपर उठकर भी वे हो जाते हैं, जगह-जगह रूखे-सूखे, ऊबड़-खाबड़, अन्यमनस्क! कहीं पूर्ण चेतन,  कहीं अतिशय जड़, कहीं बिलकुल सपाट,कहीं बेहद नुकीले!  सचमुच, अनूठी होती है, ऊपर उठने की कला, ऊँचे बने रहने की कला !  स्वयं में, स्वत्व में लय, साकार, सशरीर विस्मय! -सतीश    (Feb 20, 2023)

तट तटस्थ नहीं रहता

तट   तटस्थ   नहीं   रहता !  अपने   को   स्थिर   किये ,  अपनी   प्रवृत्तियों   में   लीन , कर्त्तव्य   में   गहरे   डूबा   रहता   है   वह   निश्चिंत , रहता   है   वह   मनस्थ  !  तट   तटस्थ   नहीं   होता  !  -  सतीश   Jan 31, 2023. 

जीवन का सहज प्रेम

भोर का सस्नेह जग जाना,  दोपहरी का चिलचिलाना, संध्या का गुलाल-सा हो जाना, रात का काली अलकों-सा  प्रकृति के सिरहाने पसर जाना, जीवन का है सहज प्रेम !  वसंत का संत-सत्व, श्रृंगार, ग्रीष्म की सशरीर उष्णता,   कटिबंध उज्ज्वलता, वर्षा की बूँदों की सिहरन,  हेमंत के भावों का नम हो जाना, शीत का संशय-ग्रस्त कंपन जीवन का है सहज प्रेम !  नानी-दादी की पुरानी बातें, माँ की अनंत लार-लोरी, पत्नी की सचेतन, सवाक् उलझन, बच्चों की निष्ठुर ज़िद, जीवन का है सहज प्रेम ! हर पल, हर पग मनुष्य बनने के प्रयास में होना,  प्रकृति, जीवन व धर्म का निष्कलुष जीना, उनकी परस्पर एकता,  उनका ऐकिक रूप-स्वरूप, संस्कृति की तुलसी-सी छवि, मर्यादा के युग-बोध से सिंचित  सार्थक, सकर्मक भव-भाव, जीवन का है सहज प्रेम!  ⁃ सतीश      Feb 14, 2023.