होली


तुम ऐसी और इतनी होली खेलो कि 

सारी शिकन-शिकायत, नफ़रत-नाराज़गी, हिचक-क्षुब्धता

ढ़ह जाये, बह जाये, दह जाये। 

फिर,

उदयाचल से अस्ताचल तक 

प्रकृति के मुख-मेरू, वक्षपटल तक,

सृष्टि के भाल से पदतल तक,

सातों तलों से सातों अम्बर तक,

मन के रोम-रेशों से कुंतल-केशों तक,

जीवन के खर-पात से सिरा-शिखरों तक,

 ग्रीष्म-शिशिर से पतझड़-वसंत तक,

समुद्रों के अगम बहाव से पर्वतों के उभरे कसाव तक,

रेतों-चट्टानों से मृत्ति-स्मृतियों-प्रवृत्तियों तक,

वादों, विवादों, अर्थों-व्यर्थों-मान्यताओं तक,

मन के सुदूर सूने तक, सन्नाटे तक

रंग-रस, राग-रग, मद-मोद से भर दो,

फुहार-फब्बारों-प्यार-पुचकारों से भर दो,

अमंद नृत्य-नाद-निनाद, नव सुरव से भर दो,

लोच-लचक, डोल-हिल्लोल, झूम-झमक दे दो!


जीवन के पोर-पोर को, हरेक मोड़-मरोड़ को 

ऐसा और इतना गुलाल-रंग दे दो कि लगे - 

मन की यह सबसे स्पष्ट, बेबाक बोली है,

सृष्टि ने अपनी सुंदरतम कृति सामने खोली है,

यह होली है, जोली है, हमजोली है! 


— सतीश 

(March 12, 2017)

 होली 




टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

आतंकवाद की शैली

बहुत बार

तुम, भोर के विन्यास सी!